असफलता

नमस्कार,
कैसे हैं ? हाँ हाँ आप तो बढ़िया ही होंगे। कभी हम से भी पूछ लीजिये की हम कैसे हैं ? चलिए आप तो पूछने से रहे, परन्तु हम तो बताएँगे। तो प्रभु बात ऐसी है की हाल तो बेहाल है।दरअसल हुआ यूँ के हम ने बहुत बड़ा और भव्य हवाई किला बना लिया था जो वास्तविकता के धरातल पे आते ही धड़ाम हो गया। पता नहीं आप में से किसी ने महसूस किया या नहीं परन्तु पिछले कुछ महीनो से हम लुप्त हो गए थे। एक आदर्श और कर्मठ कर्मचारी की भांति दिन रात काम कर रहे थे। कोल्हू के बैल के स्थान पर लोग हमारा उदहारण देने लग गए थे। आलम यह था के कार्यालय और घर में कोई फर्क नहीं रह गया था। परन्तु सरकार, कोल्हू के बैल और इंसान में फर्क तो होता ही है, बहुत बड़ा फर्क होता है। बैल समझदार होता है, कभी यह आशा नहीं रखता के उसके कार्य से खुश हो कर उसकी पदोन्निति हो जाएगी और वह बैलों का मैनेजर बन जायेगा। बैल जानता है की वो बैल ही रहेगा, परन्तु मनुष्य तो मनुष्य ही ठहरा। और हम तो बाकियों से एक कदम आगे ही सोचते है।
कार्यालय के प्रति अपनी निष्ठा एवं लगन के एवज में हमने सोचा की कार्यालय के उच्च अफसर हमे जरूर इनाम देंगे। इसी धुन में रंगे हुए हमने शेख़चिल्ली के ख्वाब और मुंगेरी लाल के हसीन सपनो का जो ताना बाना बुना के उसी जंजाल में फंस कर चारो खाने चित हो गए। देखिये साहब, असफलता का दुःख तो होता ही है, परन्तु उससे भी ज्यादा दुःख तब होता है जब असफल होने का ठीकरा किसी के सर पे न फोड़ पाएं। बचपन में कक्षा में फेल होने पे बोल देते थे की मास्टर साहब पढ़ाते ही नहीं हैं। और जब मास्टर साहब पूछते की बेटा पढ़ते क्यों नहीं हो तो बोल देते थे की घर वाले दिन भर काम करवाते हैं।बचपन तो कट गया परन्तु अब किसके सर पे फोड़े अपनी असफलता का ठीकरा? सोच रहे है सरकार के माथे मढ़ देते हैं, वैसे भी आज कल फैशन में है। और सरकार को कहा इतनी फुर्सत के कुछ बोले। सरकार की गलत नीतियों की वजह से ही हमारे कार्यालय में ऐसे लोग बैठे हैं जो हमारे जैसे हीरे को पहचान न पाये। परन्तु सोचते हैं की कही अगर कोई सरकारी कार्यवाही हो गयी तब तो लेने के देने पढ़ जायेंगे।
क्यों न पड़ोसी मुल्क को लपेटे में ले लें। हाँ, पड़ोसी मुल्क की साज़िश के तहत ही हमारे साथ ऐसा सलूक किया गया है। ऐसा बोलने से हम अपने आप को एक सच्चा परन्तु लाचार देशभक्त के रूप में स्थापित कर लेंगे। अरे जनाब, देशभक्ति पर तो कभी और चर्चा करेंगे परन्तु लाचार होने के कई फायदें है। सर्वप्रथम तो यह की आपकी अंतर आत्मा आप को दिन रात कचोटती नहीं। शांत हो कर बैठ जाती है। और दूसरा फायदा यह की एक बार आपने लाचारी दिखा दी तो आपको मुफ्त की सहानभूति मिल जाती है। लोग ताने मरना बंद कर देते हैं।और तो और लोगो की अपेक्षाओं का भार आपके कंधो से हट जाता है। फिर तो जनाब आप खुल के जी सकते हैं। बिलकुल छोटे बच्चों की तरह, जिन्हे समाज के पूर्व निर्धारित सांचो में ढलने की कोई जरुरत महसूस नहीं होती।
अरे आप भी कहा हमारी कोरी गप्पों में लग गए, जाइये कुछ सार्थक करिये। हमारा तो काम ही है बकर करना। और हाँ जाते जाते चचा ग़ालिब की ये पंक्तियाँ ले जाइये –
                    हम को मालूम है जन्नत की हकीकत, लेकिन  
                   दिल को खुश रखने को ग़ालिब यह ख़याल अच्छा है 

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