डिब्बी बंद खुशियां

नमस्कार,

अंधे के हाथ बटेर लग जाना तो आप ने सुना ही होगा। या फिर खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान ये वाला सुना होगा। यदि नहीं सुना है तो सुन लीजिये, क्यू की बस ऐसा ही कुछ हुआ हमारे साथ भी। बात कुछ ऐसी है के कुछ महीनो पूर्व हमने जोश जोश में एक सम्मलेन में भाग लेने का निर्णय लिया था। हमने सोचा था के लगे हांथो हम कुछ विद्वानों से मिल लेंगे।  ज्ञान भले ही न मिल पाये परन्तु उनके साथ मुँह टेड़ा कर के एक फ़ोटो ही ले लेंगे। अपनी भी मार्केटिंग हो जाएगी। क्युकी जनाब जो दिखता है वही बिकता है। परन्तु यह सम्मलेन तो हमारी अपेछाओं से परे निकला।अब आप ही बताएं की कोई हमारे जैसे फटीचर को तीन दिन तक पांच सितारा होटल में (कृपया इसे ताज होटल पढ़े) रहने दे और साथ में खाना भी खिलाये, तो इसे आप क्या कहेंगे? जरूर पूर्व जन्म के पुण्य ही होंगे जो देवों की इतनी असीम कृपा बरसी हम पर।

अब आप कहेंगे की यह तो असंभव है। हमारे जैसे गंगू तेली को राजा भोज वाला सम्मान ! सच कहे तो हमे भी यकीं नहीं हो रहा था। आधा दिन तो हम होटल की लाबी में ही स्तब्ध खड़े रहे, कमरे में जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहे थे। सांस भी बहुत धीरे धीरे ले रहे थे कही हमारी छोड़ी हुई कार्बन डाई ऑक्साइड से वहां का वातावरण न दूषित हो जाये, और वो लोग हम पे कोई जुर्माना ठोक दे। बहरहाल ऐसा कुछ हुआ नहीं और हम हिम्मत जुटा के अपने कमरे में गए।

अलौकिक अद्भुत अद्वितीय जैसे विशेषण कम पड़ जाते हैं कमरे का सौन्दर्य वर्णन करने के लिए। परन्तु जैसे की हमने बाथरूम का दरवाज़ा खोला हमारे मुँह से निकला “अगर फ़िरदौस बरोये ज़मीन अस्त , हमी असतो, हमी असतो हमी अस्त”, आमिर ख़ुसरो ने यह कभी कश्मीर के लिए कहा था। कश्मीर जाने के पैसे और हिम्मत तो अपने पास है नहीं। मगर जनाब ताज होटल का बाथरूम भी जन्नत से कम नहीं। ऊँगली के ईशारे पर पानी ठंडे से गरम में तब्दील हो जाता था। और तो और जनाब वहाँ की ज़मीन भी हमारे बिस्तर से ज्यादा साफ़ थी। परन्तु जो बात हमें सबसे ज्यादा मोहक लगी वो थीं वह रखी हुई छोटी छोटी डिब्बियां। और उन डिब्बियों में बंद थे रंग बिरंगे साबुन शैम्पू और न जाने क्या क्या। सौन्दर्य प्रसाधनों के बारे में हमारा ज्ञान सीमित है। परन्तु इतना विश्वास था के उन सुगन्धित उत्पादों का प्रयोग करने के बाद हम भी किसी फ़िल्मी हीरो से कम नहीं लगेंगे। बस फिर क्या था, आव देखा न ताव, लग गए हम अपने शरीर को महकाने में।  प्रभु यकीन मानिये, उस दिन भले ही शरीर से खाल निकल आती मगर मज़ाल है जो एक भी डिब्बी छूट जाये।

जिस प्रकार काले बादलो को चीरते हुए सूर्य की किरणे धरती को अपने तेज से जगमग कर देती हैं उसी प्रकार काले तन तो उजला कर हम बाथरूम से बहार निकले और अपने आप को शीशे में निहारने लगे। एक बार तो खुद को पहचान ही न पाए। अब हमारे घर का शीशा भी हमारी तरह मिडिल क्लास है। इसीलिए कभी पुरे शरीर को एक साथ एक बार में नहीं देख सकते। या तो बेल्ट के ऊपर का हिस्सा देख लीजिये या उससे नीचे का। बेल्ट भू मध्य रेखा की भांति हमारे शरीर को दो भागों में बाँट देती है। परन्तु यहाँ अपने पुरे शरीर को बिना किसी बटवारे के सम्पूर्ण रूप में देख के अचम्भा हुआ। कुछ ऐसा ही अचम्भा अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष से धरती को देख कर होता होगा।

कुछ भी कहिये, परन्तु ब्रह्मा की रची हुई इस धरती पर मानव द्वारा बनाये गए पांच सितारा होटलों की अहमियत भी कम नहीं है। आप के लिए हो न हो परन्तु हमारे लिए तो है। अपने कुछ मित्रो को जलाने के लिए और आप सभी को यकीन दिलाने के लिए कुछ तस्वीरें साथ में जोड़ रहा हूँ।

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