बदलाव

नमस्कार ,

और प्रभु कैसे हैं? उम्मीद है की सब कुशल मंगल होगा। अगर नहीं है तो चींटियों को आटा खिलाइये, क्या पता कृपा बरस जाये। कृपा कहा रुकी हुई है ये तो हम नहीं बता सकते हैं। परन्तु आपको इतना जरूर बता सकते है की निरंतर प्रयास करते रहिये, क्यों की और कुछ हम कर नहीं सकते। अब आप बोलेंगे की क्यों रात में ज्ञान बाँट रहे हैं, तो जनाब बात कुछ ऐसी है की आज कल अपनी जिंदगी एक दम ढिंचाक चल रही है। इतना कुछ एक साथ हो रहा है की हम बौरा गए हैं।

कुछ समय पूर्व अपने साथियों के बिछड़ने का दुखड़ा तो हम गा ही चुके हैं। और अब आज हम खुद चल दिए अपना बोरिया बिस्तर बांध कर। तबादला हो गया साहब। निकाल दिया गया अपने ही घर से। वैसे तो कई चीज़ों से शिकायत रहती है। लेकिन थोड़ा समय कही बिता लीजिये तो एक लगाव हो जाता है। लगाव उस टूटी हुई मेज से, उस चर-चर करती हुई कुर्सी से, उस कंप्यूटर से जो घंटो लगाता है स्टार्ट होने में और वो घड़ी जो हमेशा १० मिनट आगे रहती है। समय के साथ यह सब जीवन का एक अंग बन जाते हैं। और फिर एक दिन अचानक ही सब कुछ त्याग के आप चल देते हैं गौतम बुद्ध वाली फीलिंग लिये एक नए ठिकाने पर।

नए ठिकाने पर पहुंच कर आप पाते हैं की यहाँ पे घड़ी सही समय दिखाती है, कुर्सी भी आवाज़ नहीं करती, और कंप्यूटर तो कंप्यूटर की गति से काम करता है। इतना बदलाव एक साथ !! इस बदले हुए माहौल में अपने आप को ढालना एक कला है। इसी कला में पारंगत होने में उमर निकल जाती है। मगर ये मोह कम्बख्त जूते में चिपटी हुई चुइंग गम की तरह चिपक जाता है जो छुटाये न छूटे। पर चलिए जनाब पापी पेट का सवाल है। जाना तो पड़ेगा ही। प्रभु राम भी गए थे और श्री कृष्ण भी। हम भी चल दिए. हैं नयी मंज़िल की तलाश मे।

चलते चलते

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र मिलेगा

घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर मिलेगा

                                                – बशीर बद्र

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